भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली के संस्थापक डा. रोहताश जमदग्नि को सम्मानित करते श्री ए.आर.कोहली,भूतपूर्व राज्यपाल,मिजोरम

भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन को समर्पित है भारतमातरम राष्ट्रपीठ : डा. रोहताश जमदग्नि
नई दिल्ली 14 जनवरी : ‘सर्वविदित है कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है – भारतीय संस्कृति, विश्व की वन्दनीय संस्कृति है – सनातन संस्कृति एवं विश्व की सर्वकल्याणकारी संस्कृति है – वैदिक संस्कृति। भारतीय संस्कृति अथवा सनातन संस्कृति अर्थात वैदिक संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना पर आधारित है तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया’ की कामना करती है। अतः भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन को समर्पित एक राष्ट्रीय संस्था है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली एवं स्थानीय कार्यालय देश के विभिन्न राज्यों में संचालित हैं। भारतवर्ष की अमर क्रान्तिनेत्री महारानी लक्ष्मीबाई की 175वीं जन्म-जयन्ती के पावन अवसर पर दिनांक 19 नवम्बर 2009 को भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली की विधिवत स्थापना एवं भारत के 61वें गणतन्त्र दिवस के शुभ अवसर पर दिनांक 26 जनवरी 2010 को श्री ए. आर. कोहली, भूतपूर्व राज्यपाल, मिजोरम द्वारा संस्था के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय ‘राष्ट्र-कुंज’ पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ फहराकर भारतमातरम राष्ट्रपीठ का विधिवत श्रीगणेश किया गया था।’
भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली के संस्थापक डा. रोहताश जमदग्नि द्वारा उपरोक्त विचार भारतवर्ष के सन्त शिरोमणि स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती अर्थात ‘राष्ट्रीय युवा दिवस-2026’ की पूर्व सन्ध्या पर भारतमातरम राष्ट्रपीठ के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय ‘राष्ट्र-कुंज’ में आयोजित संस्था की वार्षिक बैठक के पश्चात प्रेस-वार्ता के दौरान व्यक्त किए गए। डॉ. जमदग्नि द्वारा बताया गया कि भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली विगत 16 वर्षों से भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन के वन्दनीय कार्य में निरन्तर रत है, जिसके अंतर्गत संस्था द्वारा सनातन संस्कृति अर्थात वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की गई है। भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली की मूल मान्यता है कि भारतवर्ष निकट भविष्य में विश्व-गुरु के रूप में पुनः प्रतिष्ठापित होने के मार्ग पर अग्रसर हो चला है, जो न केवल भारत, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के हित में है।
‘मेरे मित्रों – मेरे विचार हैं कि मैं भारत में ऐसे शिक्षालय स्थापित करूँ, जहां हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान में शिक्षित होकर भारत तथा भारत के बाहर अपने धर्म का प्रचार कर सकें। आवश्यकता है तेजस्वी, श्रद्धांसंपन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे 100 नवयुवक मिल जाएं तो विश्व का कायाकल्प हो जाए।’ भारतीय नवजागरण के अग्रदूत स्वामी विवेकानन्द के इस अमर सन्देश को उद्धृत करते हुए डॉ. जमदग्नि ने पत्रकारों द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपको भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली की स्थापना की प्रेरणा कहां से मिली थी, वताया कि भारतमातरम राष्ट्रपीठ, नई दिल्ली के सूत्रधार उनके अग्रजश्री डा. शमशेर जमदग्नि हैं, जो एक सुप्रसिद्ध भारतवादी साहित्यकार हैं तथा वर्तमान में अपर आयुक्त के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार में तीर्थराज प्रयागराज में सेवारत हैं।डॉ. रोहताश जमदग्नि द्वारा समस्त भारतवादियों को ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ की शुभकामनाएं देते हुए भारतीय युवाओं का आह्वान किया गया कि भारत के युवक- युवतियों को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस- 2026’ के शुभ अवसर पर भारतवर्ष के सन्त शिरोमणि स्वामी विवेकानन्द के जीवन से न केवल प्रेरणा लेनी चाहिए, बल्कि स्वामी जी के सन्देशानुसार भारतवर्ष को पुनः विश्व-गुरु के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लक्ष्य से भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन में अपनी महती भूमिका अदा करनी चाहिए, ताकि ठीक 1000 साल पूर्व विदेशी आक्रमणकारी महमूद गजनवी द्वारा जनवरी- 1026 में तोड़े गए सोमनाथ मन्दिर के पुनर्निर्माण की तरह सनातन संस्कृति भी पुन: विश्व-विजय के मार्ग पर अग्रसर हो और वैदिक संस्कृति का अमृत मन्त्र ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम’ चरितार्थ हो सके।




