
सेंट्रल डेस्क संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।
सह संपादक – डॉ. संजीव कुमारी।
प्यार और व्यापार में क्या भेद है ?
नई दिल्ली, 22 मई : जीवन में हम जयादातर क्या करते हैं; हम किसी के लिए कुछ करें तो हम अपेक्षा करते हैं कि इसने भी हमारे लिए कुछ करना है। जीवन में हम कुछ भी करते हैं तो हम हमेशा ये कहते हैं कि सामने वाला मेरे लिए क्या कर रहा है कि मैंने इसके लिए इतना किया। यहाँ तक कि अगर हम किसी को जन्मदिन के लिए बधाई भी कहते हैं तो हम कहते हैं कि इसने नहीं किया तो हम अगली बार इसको नहीं करेंगे। हमारे को कुछ मिलता है तो हम उसके लिए कुछ करते हैं और हम कुछ करते हैं तो कुछ वापिसी चाहते हैं। अगर कोई मेरी बात मानता है, सुनता है तो मैं उसकी सुनूँ, मानूँ और अगर वो मेरे लिए वो कुछ नहीं करता तो मैं क्यों करूँ! जब कहीं मैं इसके पास आया तो मेरे को इसने कभी चाय-कॉफी नहीं पूछी, नाश्ता नहीं करवाया तो मैं इसको क्यों करवाऊँ! हम जिसको प्यार कहते हैं, वो प्यार नहीं है, वो व्यापार है। व्यापार क्या होता है ? अब तो आप प्रोफेशनल कॉलेज में आ गए, पढ़ाई कर रहे होंगे या पढ़ेंगे कि व्यापार क्या है; लेन-देन ही व्यापार है कि मैं ये देता हूँ, आप मुझे कुछ दो। इसे व्यापार कहते हैं जिसको हम प्यार कहते हैं । हम कहते हैं अरे यार ये मेरे लिए कुछ नहीं करता, जो मेरे लिए कुछ करता है तो हम कहते हैं कि ये प्यार करता है। मम्मी-पापा ने कुछ दिया तो प्यार करते हैं और नहीं दिया तो आपको मेरे से प्यार नहीं है। भाई-बहन भी आपस में यही करते हैं । देखो रिश्तेदारी, सम्बंध, दोस्त हों, हम यही सोचते हैं कि मैंने इसके लिए किया तो ये मेरे लिए क्या करेगा। तो जहाँ हम वापिसी की अपेक्षाएँ करते हैं और अगर ना मिले तो हम नाराज होते हैं, परेशान होते हैं तो इसको प्यार नहीं कहते, व्यापार कहते हैं। इसलिए संसार में ज्यादातर सब व्यापारी ही हैं । एक व्यापारी तो वो है जिसको हम कहते हैं कि इस चीज का व्यापार करता है यहाँ पर हर कोई व्यापार में है । तो एक है व्यापार और एक है प्यार! प्यार क्या है ? प्यार मतलब जो भी मैं करता हूँ, वापिसी में मैं अपेक्षा नहीं करता। अब अगर आपके पास प्यार है तो आप देते चले जाते हो, वापिसी में नहीं चाहोगे कि ये भी मुझे प्यार करे। मैंने इसके लिए कुछ किया, ये भी मेरे लिए कुछ करे। तो ऐसे नि:स्वार्थ प्यार को शुद्ध प्यार कहते हैं। यही शुद्ध प्यार था जो मुझे सोलह साल पहले मिला और मैंने देना शुरु किया, पीछे मुड़कर नहीं देखा, एक एक को देते चले गए; और उसे देते देते आज लाख से ज्यादा का परिवार बन गया, ये प्रिय परिवार हो गया, कोई लेन-देन नहीं। पिछली बार भी हम आपके यहाँ आए थे, आप नहीं थे क्योंकि आप ज्यादातर अभी आए हो। तो प्यार का अर्थ कि यार सब खुश हो जाएँ। अब आज मैं देखता हूँ कि संसार में इतना दुख, परेशानियाँ, अशांति, चिंता, तनाव, डिप्रेशन, आत्महत्या के विचार आ रहे हैं; तो इस दिसंबर २०२३ में मेरा दुनिया पर प्रयोग पूरा हुआ कि मेरे पास आज दस साल के बच्चे से लेकर अस्सी साल की दादी तक सब मौज और खुश हैं, सब!


