
दीपक शर्मा (जिला संवाददाता )
बरेली : विद्यालय किसी राष्ट्र की रीढ़ होते हैं यहां केवल पाठ्य पुस्तकों का ज्ञान नहीं मिलता बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जाती है। जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो अक्सर गणित, विज्ञान, इतिहास और भाषा जैसे विषयों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं लेकिन यह सोचना भूल जाते हैं कि शिक्षा का असली उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं बल्कि अच्छे इंसान का निर्माण करना है। आज की प्रतिस्पर्धा भरी इस दुनिया में अंक, रैंक और कैरियर की दौड़ इतनी तेज हो गई है कि शिक्षा केवल ज्ञान तक सीमित होकर रह गई है, बच्चे किताबों से भले ही बहुत कुछ सीख जाते हैं पर यदि उनके नैतिक मूल्यों की समझ और संस्कारों की जड़ें मजबूत ना हों तो यह शिक्षा अधूरी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज को केवल डॉक्टर, इंजीनियर, वकील और वैज्ञानिक ही नहीं चाहिए बल्कि इन सब के अंदर ईमानदारी, दयालुता और जिम्मेदारी का भाव भी चाहिए। यह जिम्मेदारी विद्यालयों की ही है कि यह बच्चों को ज्ञान के साथ-साथ संस्कारों का भी उपहार दें।
संस्कारों की शिक्षा का अर्थ केवल प्रार्थना करना या धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कारों का वास्तविक अर्थ है- सत्य बोलने की आदत,बड़ों का सम्मान करना,अनुशासन का पालन करना, सहपाठियों के साथ सहयोग करना, समाज और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना। यदि विद्यालय मूल्यों को पढ़ाई और गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में स्थापित करता है तभी शिक्षा का उद्देश्य सफल माना जा सकता है। विद्यालय के शिक्षक इस दिशा में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं वे केवल पढ़ने वाले नहीं बल्कि चरित्र निर्माता भी होते है। एक शिक्षक जब अपने आचरण से बच्चों को ईमानदारी, परिश्रम और सही क्षमता का पाठ पढ़ाता है तो उसका असर किताबों से कहीं अधिक गहरा होता है। शिक्षक ही वे आदर्श होते हैं जिनसे विद्यार्थी जीवन भर प्रेरणा लेते हैं इसके अतिरिक्त विद्यालयों में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामूहिक प्रार्थनाएं, खेलकूद, स्वच्छता अभियान, सामाजिक कार्यों में सहभागिता, यह सब बच्चों को संस्कारित करने के प्रभावी साधन हैं। जब विद्यार्थी कक्षा से बाहर निकल कर समाज की वास्तविकताओं से जुड़ते हैं तो उनमें जिम्मेदारी और कर्तव्य की भावना का विकास होता है। आज समय की मांग है कि शिक्षा को केवल अंक और रोजगार तक सीमित न रखा जाए। नई पीढ़ियों को यह समझना आवश्यक है कि शिक्षा की जीवन में सबसे बड़ी सफलता है- अच्छा इंसान बनना। एक शिक्षित व्यक्ति लेकिन जो असंस्कारित है, समाज के लिए बोझ बन सकता है जबकि कम ज्ञान रखने वाला संस्कारी व्यक्ति, समाज को ऊंँचाइयों तक पहुंँचा सकता है। अतः कहा जा सकता है कि विद्यालय को ज्ञानशाला नहीं बल्कि संस्कारशाला भी होने चाहिए। जब तक शिक्षा में ज्ञान और संस्कार का संतुलन नहीं होगा तब तक राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। डिजिटल मीडिया का अति प्रयोग भी स्थिति को बढ़ावा दे रहा है। बच्चे हिंसक वीडियो देखते हैं और उनके व्यवहार की प्रतिक्रिया देखकर उन्हें अपनाने लगते हैं,अगर परिवार और स्कूल इन सब बच्चों को सही संस्कार और नैतिक शिक्षा प्रदान करें तो यह प्रवृत्ति कम की जा सकती है।
अब समय है कि हमें केवल किताबी शिक्षा पर ध्यान न देकर, बच्चों में संस्कार, नैतिक मूल्य और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने पर जोर देना चाहिए, तभी हम अपराधों की प्रवृत्ति को कम कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान, और संवेदनशील नागरिक बना सकते हैं।


