
30 जुलाई : 17 वें स्मृति दिवस पर भावांजलि
हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।
युग प्रवर्तक, युग दृष्टा व अनन्य गुणों की खान थे श्रद्धेय प्रकाश लाल जी : गुलशन ग्रोवर।
कुरुक्षेत्र,29 जुलाई : भारतीय योग संस्थान (पंजीकृत), रोहिणी, दिल्ली के संस्थापक श्रद्धेय प्रकाश लाल जी किसी युगकर्ता, युग प्रवर्तक व युग द्रष्टा से कम नहीं थे। एकनिष्ठ राष्ट्रभक्ति, अदम्य साहस, अनुशासन, दूरदर्शिता, दृढ़ता, नेतृत्व क्षमता, स्वाभिमान, सादगी, निष्काम सेवा सहित बहुत से अनन्य गुणों से भरपूर था श्रद्धेय प्रकाश लाल जी का जीवन। यह उद्गार भारतीय योग संस्थान की हरियाणा प्रांत इकाई के प्रांतीय संगठन मंत्री एवं प्रांतीय प्रेस प्रवक्ता गुलशन कुमार ग्रोवर ने आज सेक्टर 13 पार्क में हाल ही में खोले गए नए निशुल्क महिला योग साधना केंद्र पर साधिकाओं को श्रद्धेय प्रकाश लाल जी के जीवन और चरित्र के बारे में बताते हुए व्यक्त किये।
उन्होंने बताया कि श्रद्धेय प्रकाश लाल जी का जन्म 1 मार्च 1920 को पाकिस्तान के सरगोधा में हुआ था। केवल अढ़ाई साल की आयु में ही पिता का साया सिर से उठ गया । मां ने जैसे कैसे लालन-पालन किया। फिर बैंक में नौकरी की, विवाह हुआ। सन 1947 में भारत- पाकिस्तान विभाजन विभीषिका के समय जब हजारों भारतीय परिवार भय और असुरक्षा में घिरे हुए थे, उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपनी जान की परवाह न कर भारतीय सेना, परिवहन ट्रैकों व प्रशासन से समन्वय बनाकर लगभग 70,000 भारतीयों को पाकिस्तान से बचाकर भारत लाने में सक्रिय भूमिका निभाई परंतु कभी भी किसी सम्मान, पद, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि, उपहार, अवार्ड, प्रशस्ति पत्र, स्वागत की लालसा नहीं की । वह कभी गले में फूल माला भी नहीं डलवाते थे। वे कहते थे कि यदि मैंने सेवा के बदले में कुछ भी ले लिया तो वह मेरी सेवा नहीं रहेगी, मजदूरी बन जाएगी। उन्होंने सदा उन लोगों के संरक्षक की भूमिका निभाई। वर्ष 1967 में दिल्ली यूनिवर्सिटी के पास बाओंटा पहाड़ी पर उनके कान में किसी की आवाज पड़ी कि भारतीयों को विदेशी महिलाएं कुछ शुल्क लेकर योग सिखायेंगी। उनके राष्ट्र स्वाभिमान व चेतना को ठेस पहुंची कि योग तो स्वयं भगवान शिव की देन है, भारतीय ऋषि मुनियों की तपस्या का फल है जिन्होंने कभी योग सिखाने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया। उन्हें योग का कोई ज्ञान नहीं था परंतु फिर भी उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति और कठोर मेहनत की आदत ने उन से एक संकल्प करवा दिया कि हम भारतीयों को साल के 365 दिन योग सिखाएंगे और वह भी निशुल्क । इस तरह ईश्वरीय प्रेरणा से 10 अप्रैल 1967 को भारतीय योग संस्थान का उद्भव हुआ। तब से लेकर आज तक भारतीय योग संस्थान के देश-विदेश स्थित 4,500 से अधिक योग साधना केंद्रों पर सदगृहस्थियों को साल में 365 दिन निशुल्क योग सिखाया जाता है। उन्होंने कभी भी स्वयं को संस्थान का संस्थापक नहीं माना। वह कहते थे संस्थान की स्थापना ईश्वर ने ही की है। वे स्वयं को गुरु भी नहीं मानते थे, न ही गुरु परंपरा को शुरू किया या बढ़ावा दिया। मातृशक्ति का वह बहुत सम्मान करते थे और अपने सभी साधकों, कार्यकर्ताओं व अधिकारियों से बड़ा आत्मीय एवं प्रेम पूर्वक व्यवहार करते थे। अहंकार तो जीवन पर्यंत उनको छू भी नहीं पाया। वह कहते थे जब कोई रास्ता दिखाई न दे तो अंतर्मुखी होकर सच्चे मन से प्रभु की याद में बैठ जाएं, सही रास्ता स्वयं मिल जाएगा।
आरंभ में 1988 में शालीमार बाग में एक छोटे से फ्लैट में संस्थान का कार्यालय खोला गया। संस्थान के कार्य के विस्तार के साथ योग के विभिन्न अंगों की जानकारी तथा गतिविधियों को मुखरता प्रदान करने के लिए एक त्रैमासिक पत्रिका योग मंजरी का प्रथम अंक 1978 में प्रकाशित किया गया। वर्तमान में इस पत्रिका के सदस्यों की संख्या 2 लाख से भी अधिक है, पाठक तो कहीं और भी ज्यादा होंगे। 2001 में रोहिणी दिल्ली में संस्थान का पहला योगाश्रम स्थापित किया गया। वर्तमान में संस्थान के छह योग आश्रम भारत में स्थापित हैं । संस्थान किसी साधक से कोई शुल्क, किसी से स्रोत से नगद या सामग्री रूप में भी कोई दान राशि, किसी सरकार या संस्था से कोई अनुदान राशि भी स्वीकार ही नहीं करता।
30 जुलाई 2010 को जब इस धुरंधर दिव्यात्मा ने दिल्ली में अंतिम सांस ली तो आसमान भी रोया और कई घंटे तक भारी वर्षा के रूप में अंसुअन जल बरसाता रहा।
ओजस्वी वाणी, सादा जीवन, चेहरे पर बाल सुलभ मुस्कान, तेजस्वी व्यक्तित्व, धैर्य और संगम का साथ, निश्चल दृढ़ता के प्रकाश स्तंभ श्रद्धेय प्रकाश लाल जी ने लाखों लोगों के जीवन में योग का प्रकाश फैलाया। उनके समय के ध्येय वाक्य जीओ और जीवन दो, सर्वे भवंतु सुखिनः और वसुधैव कुटुंबकम आज भी संस्थान को सही दिशा दे रहे हैं और योग के माध्यम से भारतीय सभ्यता और संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन कर रहे हैं। उन्होंने अपने अंतिम संदेश में कहा था कि संस्थान ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण करना चाहता है जो लेटे को बैठा दे, बैठे को खड़ा कर दे और खड़े को दौड़ा दे। दूसरों में प्राण फूंक दे अर्थात दूसरे का प्रेरणा स्रोत बन जाए। ऐसे अनुपम निष्काम सेवा धर्मी को भारतीय योग संस्थान का एक-एक साधक कोटि-कोटि नमन करता है। ग्रोवर ने बताया कि प्रकाश लाल जी के बाद संस्थान के पूर्व अखिल भारतीय प्रधान एवं संरक्षक श्रद्धेय स्व. जवाहरलाल जी, वर्तमान में अखिल भारतीय प्रधान योग रत्न एवं प्रधानमंत्री पुरस्कार से सम्मानित माननीय देस राज जी व अखिल भारतीय महामंत्री आदरणीय ललित गुप्ता जी अपनी केंद्रीय, प्रांतीय व जिला इकाइयों का सुयोग्य मार्गदर्शन करके संस्थान का कुशल संचालन करते हुए श्रद्धेय प्रकाश लाल जी के कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।
सेक्टर 13 पार्क में भारतीय योग संस्थान की साधिकाओं को संबोधित करते हुए संस्थान के संगठन मंत्री गुलशन कुमार ग्रोवर।


