
धर्माचरण के नियम।
आमजन मन्दिरों में मूर्तियों को स्पर्श कर जन्मकुंडली के ग्रह खुद करे खराब।
तामसी शराब मांस का सेवन करने वाला मूर्ति स्पर्श कर बन रहा दोष का भागीदार।
पानीपत, प्रमोद कौशिक 4 जुलाई : उत्तर भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ. महेंद्र शर्मा ने मन्दिरों में मूर्ति स्पर्श के नियमों के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सनातन धर्म पद्धति में पूजार्चना के नियमों में इतनी कठोरता है कि जरा सी भूल होने पर अभीष्ट सिद्धि नहीं होती। पूजा प्रकरण में सब से पहला नियम नैतिकता, आहार और आचरण की शुद्धि है। जब तक जीवन में ऐसी स्थिति नहीं होगी तो हमें ईश्वरत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती। ईश्वरीय भक्ति के नियम तो नवधा भक्ति में वर्णित हैं। ‘प्रथम भक्ति संतन कर संगा’ से लेकर …
श्रवणं कीर्तनं विष्णु स्मरणं पाद सेवनम्।
अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम्।।
मन्दिरों में पूजार्चना का नियम यह है कि कायिक स्नानादि की दैनिक क्रियाओं से निवृत्त होकर शुभ्र पवित्र वस्त्र धारण कर के देवदर्शन को जाएं। सर्वप्रथम देवालय में प्रवेश करते समय मनोभाव शुद्ध और चितवृत्तियां शांत होनी चाहिए। देवालय के अंदर प्रवेश के समय मन्दिर की दहलीज पर पैर न रखें और सबसे पहले घण्टानाद करें। घण्टानाद की ध्वनि से उत्पन्न स्वर तरंगों और कम्पन से हमारे मस्तिष्क की सुषुप्त और तन्मात्रायें जाग्रत हो जाती हैं और उनमें संवेदन तरंगों का संचार सुचालित हो जाता हैं और मानसिक रोगों का शिकार नहीं होते l इसके पश्चात मन्दिर के सभी स्थापित विग्रहों के दर्शन करें सूर्योपासना करें, शिवोपासना करें। इस विषय को गम्भीरता से लें कि मन्दिर में प्रतिष्ठित विग्रहों को स्पर्श करने का वैदिक अधिकार केवल मन्दिर के पुजारी को है। आप भगवान के किसी भी विग्रह को स्पर्श नहीं कर सकते। मन्तव्य हो कि श्री जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य श्री स्वामी निश्चलानन्द जी सरस्वती जी महाराज श्री ने अयोध्या में श्री राम मन्दिर में श्रीराम जी की दिव्य मूर्ति स्थापना में जाने से इसलिये इन्कार कर दिया था कि प्रधानमन्त्री महोदय को भगवान के विग्रह को स्पर्श करने का अधिकार.नहीं है। वास्तव में मन्दिर और देवालय ब्राह्मणों के वैदिक उद्योग हैं। ईश्वरीय पूजा से इनके परिवार का पालन होता है और ब्राह्मणों के पुत्र ब्राह्मण ही वेदों की शिक्षा के बाद अपने ही देवालयों में देवसेवा परम्परा को जारी रखते हैं लेकिन कालभेद से यह प्रथा अब नहीं रहीं। कुल पुरोहित परम्परा भी मृत्यु के कगार पर है। कुलपुरोहित के बिना कोई भी यज्ञ अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता। प्रश्न यह है कि आखिर कुल पुरोहित कौन. होते हैं,,, जिन ब्राह्मणों ने आपकी तीन पीढ़ियों के नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, मृत्योपरान्त धर्मशान्ति आदि संस्कार सम्पादित करवाए हैं आप उनका त्याग नहीं कर सकते। आप इसी तरह अपने कुलगुरु और तीर्थपुरोहित का भी त्याग नहीं कर सकते। तीर्थ पुरोहितों के यहां तो हमारे पितृ शब्द रूप में विराजित हैं। कुलगुरु हमें पीढ़ी दर पीढ़ी अज्ञान से ज्ञान की ओर के सचेतक और प्रणेता हैं।
समयभेद से ब्राह्मण केअर्थिक रूप से सम्पन्न न होने के कारण अशिक्षित होने मन्दिर और देवालयों का संचालन सामाजिक संस्थाएं करती आ रहीं हैं।
सनातन जगत और ब्राह्मणों की जानकारी के लिए एच आर सी ई एक्ट 1951 किसी भी विषय का समाधान परस्पर समझदारी से करना चाहिए। इस में कोई संशय नहीं है कि सभी ब्राह्मण आर्थिक रुप से सम्पन्न नहीं है l लेकिन यह समस्या तो सभी वर्णों में है केवल ब्राह्मणों में नहीं, परमात्मा सभी को उसके प्रारब्ध अनुसार पुष्ट करते हैं। शेष तो सब वर्णो को ही एक समान पुरुषार्थ करना ही होगा, भाग्य का निर्माण कर्मौं से होता है।
ब्राह्मणों के थाली प्रकरण पर मेरा विषय सहमति या असहमति का नहीं है, यह विषय कानूनी है, मन्दिर में दान के रूप में आने वाले धन का वास्तविक स्वामी कौन है ? 2016 में मेरा जागेश्वर (नागेश्वर) ज्योतिर्लिंग पर जाना हुआ जब महामहिम गुरुदेव भगवान जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी दिव्यानंद जी ”तीर्थ” का चातुर्मास प्रवास विश्राम यहीं चल रहा था। यहां ज्योतिर्लिंग का नाम मृत्युंजय महादेव ज्योतिर्लिंग है जो कि वास्तविक रूप से नागेश्वर दारुक वने है, जहां पर ज्योतिर्लिंग श्लोक में वर्णित देवदारु के वृक्ष मौजूद है। यदि ऐसा नहीं होता तो पूज्य गुरुदेवश्री यहां पर चतुर्मास प्रवास विश्राम ही क्यों करते ? जैसा कि चढ़ावे का झगड़ा सर्वत्र है यहां भी पैसों को लेकर यही समस्या थी, संस्था और ब्राह्मणों में नोकझोंक/झगड़ा नैनीताल हाईकोर्ट तक गया तो माननीय नैनीताल उच्च न्यायालय ने केंद्रीय अधिनियम एच आर सी ई 1951 को दरकिनार करते हुए यह रुलिंग दी थी कि जितना भी धन किसी अनुष्ठान में आयेगा उस की रसीद कटेगी, मन्दिर की व्यवस्था के लिए उस धन का 30% मन्दिर ट्रस्ट को जायेगा , शेष उस मन्दिर के पुजारी को जो वहां पर उस देवस्थान के प्रांगण में अनुष्ठान करवायेगा। उस में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि यह निर्णय उस मन्दिर के पुरोहित तक सीमित रहेगा या बाहर के ब्राह्मणों पर भी यह रुलिंग लागू होगी. क्योंकि वहां तो केवल महामृत्युंजय यज्ञ होते हैं जो वहां के नियुक्त पुजारी करवाते हैं। शायद बाहरी ब्राह्मणों की एंट्री नहीं थी क्योंकि इस केस में कोई बाहर का ब्राह्मण पार्टी ही नहीं था। कुछ समय तो माननीय नैनीताल उच्च न्यायालय का यह फैसला चला, मन्दिर परिसर में पुजारियों और संस्थान के मध्य संधि समझौता की यह धारा एक बहुत बड़े साईन बोर्ड पर तीर्थ यात्रियों के सूचनार्थ लगी हुई थी। लेकिन मन्दिर ट्रस्ट माननीय नैनीताल उच्चन्यायालय के निर्णय से असन्तुष्ट था और निर्णय के विरुद्ध माननीय सुप्रीम कोर्ट में एच आर सी ई 1951लेकर चला गया, पहली ही रुलिंग में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने उच्चन्यायालय के निर्णय पर सटे ऑर्डर लगा दिया था कि ईश्वर की भूमि पर किसी को भी एक पाई पैसा उठाने या लेने का कोई अधिकार नहीं है।
ईश्वर की मन्दिर में चढाई गई दानराशि में किसी को भी दान के रूप में आयी धनराशि के किसी भी अंश को लेने काअधिकार नहीं है। अभी भी यह केस 1951 के कानून के अधीन माननीय उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन है।
तमिलनाडु और आन्ध्रप्रदेश में धार्मिक संस्थानों की (38 लाख की वैल्यू इन 1951) वाली 38000 देव संपत्तियों को मठाधीशों और स्थानीय चोरों से बचाने के लिये 1951 में तत्कालीन भारतीय केंद्र सरकार नें मद्रास हिन्दू धार्मिक बंदोबस्त act 1951( एच आर सी ई 1951) पास करवाया कर कड़े सरकारी अधिनियम के अंतर्गत ऑडिट करवाना आवश्यक कर दिया था, तब से लेकर आज तक इन देवस्थानों से नगदी और सम्पति पर कोई विवाद नहीं हुआ। गत वर्ष तिरुपति देवस्थानम् में लड्डु प्रसाद के प्रकरण के अतिरिक्त कोई विवाद नहीं हुआ अयोध्या जी में तो श्री राम मन्दिर तो अभी सवा दो साल पहले ही बना है, यहां पर यदि ईमानदारी से एच आर सी ई 1951एक्ट लागू किया होता कि मन्दिरों में एकत्र होने वाली दैनिक दानराशि बैंक में जमा होती तो आज किसी की फजीहत न होती।
1961 में खजुराहो टैम्पलज में से बहुमुल्य मूर्तियां चोरी हुई थी तो तत्कालीन केन्द्र सरकार ने सीबीआई के माध्यम से चोरी की गई मूर्तियां बरामद कर चोरों को जेल भेजा था।
1979 से श्री तिरुपति देवस्थानम् के ट्रस्ट टीटीडी का सारा दैनिक चढावा बैंक में जमा होता है।
1980 में तमिलनाडु के चोल मन्दिर से आईडोल विंग से सुभाष कपूर द्वारा चुराई गई मूर्तियां बरामद की थी। विस्मय की बात तो यह है कि राष्ट्रीय महत्व के देवस्थानों पर धांधली रोकने यह ऐक्ट उन्होंने पास करवाए जिन्हें कुछ लोग मुसलमान कहते हैं।
विस्मय की बात तो यह है कि ऐसे कानून उन नेताओं ने पास करवाये जिन्हें लोग गालियां देकर अपमानित करते हैं कि वह सनातन विरोधी हैं यहां तक कि उन्हें मुसलमान कहते हैं। अब देश में कौन हिन्दु है और कौन मुसलमान… यह निर्णय तो इन के कार्यों से हो चुका है कि आज के दिन मन्दिर लूटने वाला गजनवी कौन है?
मैं श्री सनातन धर्म संगठन पानीपत में महासचिव पद पर था, इस केस के बारे में कुछ जानकारी रखता था, इसलिए ब्राह्मणों के थाली आंदोलन में जाने से बचता था कि हमारा विषय कमजोर है, लेकिन उत्तेजित ब्राह्मणों में सुनने वाला कोई नहीं था, जिसे समझाया जा सके। लेकिन कुछ महानुभावों ने सारे ब्राह्मण समाज की छवि धूमिल कर दी क्यों कि वह यथार्थ को नहीं जानते थे।
आप गुग्गुल के माध्यम से केस तलाश सकते हैं..
तमिलनाडु में मद्रास हाई कोर्ट का भी यही सुप्रीम कोर्ट जैसा निर्णय आया हैं। कुछ ब्राह्मणों ने एक तो किसी से कोई कानूनी परामर्श नहीं लिया दूसरे कूछ महानुभावों ने समाज में अपनी गलत और अशोभनीय वाणी और व्यवहार से सभी ब्राह्मणों की आध्यात्मिक छवि इतनी धूमिल कर ली कि समाज में कौई भी प्रतिष्ठित ब्राह्मण या संत समाज इस विषय में पड़ना चाहता। अब तो कोर्ट ऑर्डर भी आ गए हैं। कलियुग में पापाचार के कारण भगवान को समर्पित दानराशि का गबन होना धर्म के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
क्षमा सहित… यहीं तथ्य सच है l
सदैव आप के संग गैर राजनैतिक आचार्य डाॅ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’ पानीपत।


