जग ज्योति दरबार में मंत्रोच्चारण के साथ प्रारम्भ हुआ तीन दिवसीय होलिका अनुष्ठान

वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक।

होलिका अनुष्ठान के पहले दिन यज्ञ में दी गई आहुतियां।

कुरुक्षेत्र, 12 मार्च : जग ज्योति दरबार में प्रारम्भ हुए तीन दिवसीय होलिका अनुष्ठान के पहले दिन बुधवार को भगवान श्री गणेश, भगवान श्री विष्णु तथा भगवान शिव का आहवान कर पूजन किया गया। इस के उपरांत महंत राजेंद्र पुरी तथा अन्य संतों द्वारा यज्ञ में आहुति दी गई। महंत राजेंद्र पुरी ने बताया कि होलिका अनुष्ठान के दूसरे दिन 13 मार्च को पूरे विधि विधान के साथ फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन होगा। 14 मार्च को यज्ञ में पूर्ण आहुति दी जाएगी एवं फूलों व रंगों से होली खेलते हुए अनुष्ठान का समापन होगा। उन्होंने बताया कि होली उत्सव होलिका-प्रहलाद के साथ ही बसंत ऋतु और नई फसल से भी जुड़ा हैं। रंगों का यह त्यौहार उत्साह और आनंद का प्रतीक है। इस समय पेड़ों से पत्ते गिरने लगते हैं और नए पत्ते आने लगते हैं। महंत राजेंद्र पुरी ने कहा कि प्रकृति हमें बताती है कि जब पुरानी चीजें खत्म होती हैं, तब ही नई शुरुआत होती है। होली पर साधना एवं पूजा का हर दृष्टि से विशेष महत्व है। उन्होंने बताया कि प्रहलाद हिरण्यकश्यप का पुत्र था, वह विष्णु भक्त था। इस बात से हिरण्यकश्यप बहुत क्रोधित था और प्रहलाद को मार देना चाहता था। उसकी कई कोशिशों के बाद भी हर बार विष्णु कृपा से प्रहलाद बच जाता था। तब हिरण्यकश्यप की बहन होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई। होलिका को आग में न जलना का वरदान मिला हुआ था, लेकिन विष्णु कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जल गई। ये घटना फाल्गुन पूर्णिमा की मानी जाती है। तब से होलिका दहन का त्यौहार मनाया जाने लगा। महंत राजेंद्र पुरी ने बताया कि होली के समय से ही बसंत ऋतु की शुरू होती है। मान्यता है कि वसंत ऋतु के स्वागत में रंगों का त्यौहार मनाया जाता है। कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए बसंत ऋतु को प्रकट किया था। बसंत को ऋतुराज कहा जाता है। इसके बाद जब शिव जी का तप भंग हुआ तो उन्होंने कामदेव भस्म कर दिया था। बाद में कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर शिव जी उसे ये वरदान दिया था कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। ये घटना फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि की ही घटना मानी गई है। महंत राजेंद्र पुरी ने कहा कि यह फसल पकने का समय है। इन दिनों में अधिकतर किसानों की फसलें तैयार हो जाती हैं, किसान फसल पकने की खुशी मनाने के लिए रंगों से त्यौहार मनाते हैं।
महंत राजेंद्र पुरी।

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