सनातन संस्कृति के प्राणाधार आदि गुरु शंकराचार्य के ज्ञान और परिश्रम से ही सनातन संस्कृति की रक्षा हुई : मिश्र

सनातन संस्कृति के प्राणाधार आदि गुरु शंकराचार्य के ज्ञान और परिश्रम से ही सनातन संस्कृति की रक्षा हुई : मिश्र

आदि गुरु शंकराचार्य की शिक्षाओं एवं विचारों को आत्मसात करके ही आज की अशांत दुनिया में अहिंसा एवं शांति की स्थापना हो सकती है।

कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 22 अप्रैल : आदि शंकराचार्य वेदों के परम विद्वान थे, प्रखर भविष्यदृष्टा थे। उन्होंने सनातन वैदिक धर्म के अपने ज्ञान से तत्कालीन समय में केवल रक्षा ही नहीं की वरना सनातन धर्म और वेदों का अस्तित्व और प्रतिष्ठा अनंत काल तक बनाए रखने की दृष्टि के साथ अपने जीवनकाल में ही जगह जगह भ्रमण कर वेदान्त दर्शन का प्रचार प्रसार किया । इसी उद्देश्य से उन्होंने देश की चारों दिशाओं में चार धाम, चार पीठ, बारह ज्योतिर्लिंगों और अखाड़ों की स्थापना की। यह विचार मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने आदि गुरु शंकराचार्य की जयंती के उपलक्ष्य में मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा आयोजित अद्वैत संवाद कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ।
अद्वैत संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा आज से अठारह सौ वर्ष पूर्व केरल में जन्में आदि गुरु शंकराचार्य ने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में ही वेदों का अध्ययन,भारत भ्रमण और दर्शन का प्रचार किया। आदि गुरु शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रणेता, संस्कृत के विद्वान, उपनिषद व्याख्याता और सनातन धर्म प्रचारक थे। हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार इनको भगवान शंकर का अवतार माना जाता है।आदि शंकराचार्य ने अल्पायु में ही अपने अलौकिक वैदिक ज्ञान और वेदान्त दर्शन से बौद्ध, मीमांसा, सांख्य और चार्वाक अनुयायियों की वेद विरोधी भावनाओं को सफल नहीं होने दिया। आदि शंकराचार्य ने ज्ञान मार्ग के द्वारा ही न केवल बौद्ध धर्म और अन्य संप्रदायों के विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर वेद धर्म का मान बढ़ाया बल्कि उन धर्म और संप्रदायों के अनुयायियों ने भी वैदिक दर्शन को स्वीकार कर लिया। सनातन संस्कृति के प्राणाधार आदि गुरु शंकराचार्य के ज्ञान और परिश्रम से ही सनातन संस्कृति की रक्षा हुई।
डॉ.श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा शंकराचार्य द्वारा अद्वैत दर्शन यह सिद्धांत बताता है कि ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्य है, यह क्षणिक संसार ब्रह्म का भ्रमण रूप है। शंकराचार्य के अनुसार सांसारिक मोह से मुक्त होकर निष्काम भाव से कर्तव्यों का पालन करना ही सच्ची साधना है। आदि गुरु शंकराचार्य की शिक्षाओं एवं विचारों को आत्मसात करके ही आज की अशांति दुनिया में अहिंसा एवं शांति की स्थापना हो सकती है। आज के वर्तमान विश्व के लिए आदि गुरु शंकराचार्य बहुत ही प्रासंगिक है। अद्वैत संवाद कार्यक्रम में मातृभूमि शिक्षा मंदिर के विद्यार्थियों ने भी अनेक संस्मरण प्रस्तुत किए। सभी विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम का समापन कल्याण मंत्र से हुआ।

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