
नवग्रहों को साधने का माध्यम है रसोई, सामूहिक भोजन के महत्व को समझें : डॉ. महेंद्र शर्मा
थानेसर,प्रमोद कौशिक/ संजीव कुमारी 8 जुलाई : उत्तरभारत के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ. महेंद्र शर्मा ने बताया कि भारतीय संस्कृति में रसोई केवल भोजन पकाने का स्थान नहीं, बल्कि परिवार, संस्कार और ऊर्जा का केंद्र मानी गई है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार घर की रसोई और उसमें बनने वाला भोजन परिवार के सदस्यों के जीवन तथा उनकी जन्मकुंडली में स्थित नवग्रहों के प्रभाव से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।
आधुनिक जीवनशैली में आर्थिक सम्पन्नता बढ़ने के साथ अनेक परिवारों में भोजन बनाने का कार्य घरेलू सहायकों या बाहरी सेवाओं पर निर्भर होता जा रहा है। इसके कारण रसोई से जुड़ा वह आत्मीय वातावरण, स्नेह, वात्सल्य और पारिवारिक सहभागिता धीरे-धीरे कम होती दिखाई देती है, जो भारतीय परिवार व्यवस्था की पहचान रही है।
मान्यता है कि जब घर की रसोई में परिवार की गृहिणियाँ अथवा परिवार के सदस्य स्वयं प्रेम और श्रद्धा से भोजन बनाते हैं, तो उसमें केवल स्वाद ही नहीं बल्कि सकारात्मक भावनाएँ और सात्विक ऊर्जा भी सम्मिलित होती है। इसके विपरीत जब परिवार के सदस्य अलग-अलग स्थानों पर अथवा अकेले भोजन करने लगते हैं, तो सामूहिकता और पारिवारिक संवाद में कमी आने लगती है।
भारतीय परंपरा में सामूहिक भोजन को परिवार की एकता का प्रतीक माना गया है –
“संग सखा सब भोजन करहिं, मात पिता आज्ञा अनुसरहिं।”
ज्योतिषीय दृष्टि से यह विश्वास किया जाता है कि परिवार के साथ बैठकर भोजन करने से ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त होती है। माता-पिता के सम्मान, भाई-बहनों के साथ आत्मीयता तथा परिवार के बुजुर्गों के प्रति आदर की भावना घर के वातावरण को सकारात्मक बनाती है।
धर्मसम्मत साधनों से अर्जित धन, अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ सद्व्यवहार, पशु-पक्षियों के लिए अन्न निकालना, अतिथियों का सम्मान करना तथा भोजन से पहले ईश्वर को भोग लगाना भारतीय संस्कृति के ऐसे मूल्य हैं जिन्हें शुभ और कल्याणकारी माना गया है।
परंपरागत मान्यता के अनुसार प्रातःकाल भोजन बनाते समय गोग्रास निकालना, पशु-पक्षियों के लिए भोजन की व्यवस्था करना तथा भगवान को अन्न का भोग अर्पित करना परिवार में सुख-समृद्धि और मंगल का कारण बनता है। इसी प्रकार रसोई की स्वच्छता, भोजन का सम्मान और अन्न का अपव्यय न करना भी भारतीय जीवन मूल्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
आज के समय में बाहर का भोजन और ऑनलाइन भोजन मंगाने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। यद्यपि सुविधा के दृष्टिकोण से यह उपयोगी है, फिर भी घर के बने भोजन में परिवार के सदस्यों का स्नेह, आत्मीयता और अपनापन निहित रहता है। इसी कारण भारतीय परंपरा में कहा गया है— “जैसा अन्न, वैसा मन।”
सामूहिक भोजन केवल भोजन ग्रहण करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि परिवार को जोड़ने वाला संस्कार है। जब परिवार के सदस्य एक साथ बैठते हैं, संवाद करते हैं और भोजन साझा करते हैं, तो पारिवारिक संबंधों में विश्वास, पारदर्शिता और आत्मीयता का विकास होता है।
आस्था और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शुद्ध मन, सात्विक भोजन, सेवा, दान और पारिवारिक सौहार्द जीवन में सकारात्मकता और शुभ फल प्रदान करते हैं। चाहे कोई व्यक्ति इन मान्यताओं को धार्मिक दृष्टि से देखे या सामाजिक दृष्टि से, इतना निश्चित है कि घर की रसोई और सामूहिक भोजन भारतीय परिवार व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक हैं।
डॉ. महेन्द्र शर्मा ‘महेश’
श्री गुरु शंकराचार्य के पदाश्रित।


