संस्कृत भाषा से ही हमारी संस्कृति बची रहेगी : कुलपति प्रो. करतार सिंह धीमान

संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक संरचना है : प्रो. ललित गौड़।

कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 18 सितंबर : श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि भारतीय संस्कृति की जड़ें संस्कृत भाषा में निहित हैं। यदि हमें परंपराओं, आयुर्वेदिक शास्त्रों और धरोहर को संरक्षित रखना है तो संस्कृत का गहन अध्ययन जरूरी है। वे आयुर्वेद संहिता एवं सिद्धांत विभाग द्वारा आयोजित 10 दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर के समापन समारोह में बोल रहे थे। इस अवसर पर आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता, आयुर्वेद संहिता एवं सिद्धांत विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृष्ण कुमार, सहायक प्रोफेसर सीमा रानी, व संस्कृत शिक्षक अंकित समेत अन्य उपस्थित रहे।
उन्होंने कहा कि सुश्रुत संहिता, चरक संहिता और वाग्भट्ट संहिता जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य है। संस्कृत में दक्ष विद्यार्थी ही अच्छे वैद्य और शिक्षक बन सकते हैं। प्रो. धीमान ने स्पष्ट किया कि आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथ जैसे सुश्रुत संहिता, चरक संहिता और वाग्भट्ट संहिता को सही मायने में समझने और उनका गहराई से अध्ययन करने के लिए संस्कृत का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। यदि विद्यार्थी संस्कृत में दक्ष होंगे तो वे बेहतर वैद्य (आयुर्वेदिक चिकित्सक) और शिक्षक के रूप में समाज की सेवा कर सकेंगे। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि संस्कृत भाषा को आत्मसात करने के लिए निरंतर अभ्यास और सतत मेहनत जरूरी है। तभी इस भाषा की वास्तविक सुंदरता और उसकी वैज्ञानिकता को समझा जा सकता है।
वक्ताओं ने बताई संस्कृत की वैज्ञानिकता और सांस्कृतिक महत्ता
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्रो. ललित कुमार गौड़ ने संस्कृत की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसकी व्याकरण प्रणाली इतनी सटीक है कि इसे कंप्यूटर भाषा में भी अपनाया जा सकता है। संस्कृत ग्रंथों में गणित, खगोल शास्त्र और चिकित्सा का प्रामाणिक ज्ञान निहित है। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक संरचना है।प्रो. गौड़ ने बताया कि ऋग्वेद सबसे प्राचीन कृति है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह दर्शाता है कि हमारे पूर्वजों ने हजारों साल पहले ही ब्रह्मांड, प्रकृति और जीवन के रहस्यों को समझने का प्रयास किया था।
वहीं, संस्कृत भारती हरियाणा न्यास के अध्यक्ष श्री रामनिवास शास्त्री ने कहा कि संस्कृत हमारी मातृभाषा है। इसे अपनाकर ही हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रह सकते हैं। संस्कृत केवल धार्मिक नहीं, बल्कि जीवन जीने की भाषा है। कहा कि आज की पीढ़ी अगर संस्कृत से दूर हो रही है तो इसका अर्थ है कि हम अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूरी बना रहे हैं। इस 10 दिवसीय शिविर में विद्यार्थियों को संस्कृत बोलने और समझने का प्रशिक्षण दिया गया और उन्होंने इसे जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

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