महिला दिवस पर विशेष

आयुर्वेद परंपरा और नवाचार को नई गति दे रही ‘नारी शक्ति’

हरियाणा संपादक – वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक दूरभाष- 94161 91877

कुरुक्षेत्र, 7 मार्च लेखक : डॉ. रितेश, असिस्टेंट प्रोफेसर, क्रिया शारीर विभाग, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, पंचकूला
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर इस वर्ष की वैश्विक थीम “राइट्स, जस्टिस, एक्शन-फॉर ऑल वूमैन एंड गर्ल्स”, महिलाओं और बालिकाओं के अधिकार, समानता और उनके समग्र सशक्तिकरण की दिशा में ठोस कदम उठाने का आह्वान करती है। यह थीम इस बात पर बल देती है कि हर महिला और बालिका को स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीवन जीने का समान अवसर प्राप्त होना चाहिए।
भारतीय समाज में महिलाओं को परिवार की “पहली डॉक्टर” माना जाता है। घर की रसोई में उपलब्ध जड़ी-बूटियों से परिवार सदस्यों की मौसम के अनुसार सेहत का ख्याल रखना आयुर्वेदिक जीवन शैली का अंग है। ग्रामीण भारत में आज भी दादी-नानी के घरेलू नुस्खे आयुर्वेदिक ज्ञान की जीवंत मिसाल हैं। सर्दी-जुकाम में तुलसी और अदरक का काढ़ा, पेट दर्द में अजवाइन का उपयोग या त्वचा की देखभाल के लिए हल्दी और चंदन का प्रयोग ये सभी आयुर्वेदिक परंपरा के ही रूप हैं, जिन्हें महिलाओं ने पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में आयुर्वेद ने सदैव महिला स्वास्थ्य को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया है। आयुर्वेद में महिला को केवल परिवार की धुरी ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के स्वस्थ भविष्य की आधारशिला माना गया है।
गर्भावस्था तथा प्रसव देखभाल से लेकर महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े अनेक विषयों पर आयुर्वेद में विस्तृत वर्णन मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार महिला का स्वास्थ्य केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन से भी जुड़ा होता है। संतुलित आहार, योग, ध्यान और प्राकृतिक औषधियां महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक होती हैं। विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान आयुर्वेदिक देखभाल को बहुत महत्व दिया गया है। आयुर्वेद में ‘गर्भसंस्कार’ की परंपरा भी इसी का हिस्सा है, जिसमें गर्भस्थ शिशु के शारीरिक और मानसिक विकास पर ध्यान दिया जाता है। आज की महिला आयुर्वेदाचार्य इन परंपरागत ज्ञान को आधुनिक चिकित्सा समझ के साथ जोड़कर महिलाओं के लिए समग्र स्वास्थ्य समाधान विकसित कर रही हैं। भारतीय ग्रंथों में यह स्पष्ट है कि समाज में महिलाओं की भूमिका केवल रोगी के रूप में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की संरक्षक के रूप में भी रही है।
आज आयुर्वेद केवल भारत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विश्व के अनेक देशों में इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। इस वैश्विक विस्तार में भी महिला विशेषज्ञों की भूमिका उल्लेखनीय है। कई महिला आयुर्वेदाचार्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, शोध परियोजनाओं और स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भाग लेकर आयुर्वेद के सिद्धांतों और उपचार पद्धतियों को दुनिया तक पहुंचा रही हैं। इससे भारत की इस प्राचीन चिकित्सा प्रणाली की प्रतिष्ठा और भी मजबूत हो रही है।
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, पंचकूला सरकार द्वारा चलाए जा रहे आयुष कार्यक्रमों में चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भागीदारी रहती है, जोकि समाज में महिलाओं को प्राकृतिक जीवनशैली एवं आयुर्वेद में वर्णित दिनचर्या आदि को अपनाकर स्वास्थ्य के लिए जागरूक करते हैं। इस वर्ष की थीम “राइट्स-जस्टिस-एक्शन” के संदर्भ में आयुर्वेद हमें यह संदेश देता है कि महिलाओं के स्वास्थ्य का अधिकार केवल उपचार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि निवारक स्वास्थ्य, पोषण, मानसिक संतुलन और जीवनशैली के समुचित मार्गदर्शन तक सभी की समान पहुंच सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
महिला दिवस के अवसर पर यह स्वीकार करना आवश्यक है कि आयुर्वेद की शक्ति ग्रंथों के साथ, उन महिलाओं के समर्पण और ज्ञान में भी निहित है, जो इस परंपरा को संजोते हुए उसे भविष्य की ओर अग्रसर कर रही हैं। परिवार के स्वास्थ्य की संरक्षक से लेकर आधुनिक चिकित्सा और शोध तक, महिलाएं आयुर्वेद की सशक्त वाहक हैं। महिला दिवस 2026 की थीम आयुर्वेद के उस मूल सिद्धांत से भी मेल खाती है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य और सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। इस प्रकार ‘नारी शक्ति’ न केवल आयुर्वेद की संरक्षक है, बल्कि उसके नवाचार और वैश्विक विस्तार की प्रेरक शक्ति भी है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इस अवसर पर हम यह संकल्प लेते हैं कि महिलाओं और बालिकाओं के स्वास्थ्य अधिकार, समानता और गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक प्रयास करेंगे तथा आयुर्वेद के सिद्धांतों के माध्यम से स्वस्थ, सशक्त और जागरूक समाज के निर्माण में योगदान देंगे। “स्वस्थ नारी- सशक्त समाज” की भावना के साथ सभी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

VV NEWS

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