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मुर्गीपालन ने बदली श्रीमती अनुसुइया नेताम की जिंदगी

शासन के आर्थिक सहयोग और खुद की मेहनत से बनीं आत्मनिर्भर

उत्तर बस्तर कांकेर, 09 मार्च 2026/ राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन महिला समूहों को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक प्रगति की नई इबारत लिख रहा है। कल तक जो महिलाएं सिर्फ अपने घर और परिवार के दायरे तक सीमित थीं, आज वे आर्थिक एवं सामाजिक रूप से स्वावलंबी बन रही हैं। महिलाएं  स्व सहायता समूहों के माध्यम से विभिन्न सृजनात्मक एवं आर्थिक गतिविधियांं से  समाज में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर रही हैं। जिले के सुदूरवर्ती अंतागढ़ विकासखण्ड के ग्राम बेलोंडी की श्रीमती अनुसुइया नेताम ने मुर्गीपालन व्यवसाय शुरू कर अपनी मेहनत और लगन से सफलता की नई मिसाल कायम की है।
श्रीमती अनुसुइया नेताम ने बताया कि उनका परिवार मुख्य रूप से खेती और मजदूरी पर निर्भर था। वर्षा आधारित खेती होने के कारण कई बार फसल अच्छी नहीं होती थी, जिससे परिवार की आय अस्थिर और कम थी। वहीं आय सीमित होने के कारण घर के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया था। श्रीमती नेताम ने बताया कि इसके बाद उन्होंने जय मां संतोषी स्व-सहायता समूह से जुड़कर मुर्गी पालन को आजीविका के रूप में अपनाने का निर्णय लिया। शुरुआत में समूह के माध्यम से 30 हजार रूपए ऋण लेकर उन्होंने मुर्गी पालन व्यवसाय शुरु किया, धीरे-धीरे इससे अच्छी आमदनी होने लगी। इसके अलावा उन्हें समूह के माध्यम से बचत का महत्व, ऋण प्रबंधन और छोटे व्यवसायों की जानकारी मिली और समूह द्वारा महिलाओं को आय बढ़ाने के विभिन्न तरीकों और शासकीय योजनाओं के बारे में भी बताया गया, जिससे उनमें आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा जागृत हुई। उन्होंने यह भी बताया कि ग्राम संगठन और क्लस्टर संगठन से मार्गदर्शन से समूह से जुड़ने के बाद वे ‘सूर्या महिला ग्राम संगठन बेलोंडी‘ और ‘आशा महिला क्लस्टर संगठन अमाबेड़ा’ की बैठकों में भी नियमित रूप से भाग लेने लगीं। व्यवसाय की शुरूआत में उन्होंने लगभग 360 देशी चूजों की खरीदी की, जिस पर लगभग 11,880 रूपए खर्च हुए। इसके अतिरिक्त दाना, पानी के बर्तन, वैक्सीन और टॉनिक आदि पर भी खर्च किया गया। इस प्रकार मुर्गी पालन व्यवसाय में लगभग 33 हजार 360 रूपए का प्रारंभिक निवेश किया गया।
श्रीमती अनुसुइया नेताम ने बताया कि मुर्गी पालन व्यवसाय से परिवार की आर्थिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव आया है। कुछ महीनों की मेहनत के बाद मुर्गियां अच्छी तरह विकसित होकर बिक्री के लिए तैयार हुइंर्, तब उन्होंने लगभग 200 मुर्गियां बेचीं, जिससे उन्हें 55 हजार रूपए की शुद्ध आय प्राप्त हुई। अब बच्चों की पढ़ाई तथा अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। स्व सहायता समूह, ग्राम संगठन और ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से उन्होंने मुर्गी पालन के माध्यम से न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी आज वह प्रेरणा स्रोत बन गई हैं।

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