
दीपक शर्मा (जिला संवाददाता )
बरेली : उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से परिषदीय विद्यालयों को बेहतर बनाने और बच्चों को सुरक्षित, स्वच्छ एवं सुविधाजनक शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से मिशन कायाकल्प चलाया जा रहा है। अभियान के तहत सरकारी विद्यालयों में साफ-सुथरे कक्षा-कक्ष, पेयजल, शौचालय, फर्नीचर, बिजली, खेलकूद की सुविधाओं समेत विभिन्न मूलभूत व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने का दावा किया जाता है। सरकार का इरादा स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी बेहतर शैक्षणिक माहौल मिले।
लेकिन बरेली के तमाम सरकारी विद्यालयों की तस्वीर इन दावों पर सवाल खड़े करती नजर आती है। GEN-G की ओर से चलाए जा रहे अभियान के तहत जब विद्यालयों की जमीनी हकीकत सामने लाने की कोशिश की गई तो कई जगह मिशन कायाकल्प के काम और उनके वास्तविक उपयोग पर गंभीर सवाल दिखाई दिए।
कई विद्यालयों में हल्की बारिश के बाद ही परिसर में जलभराव की स्थिति बन जाती है। ऐसे में बच्चों को स्कूल परिसर में आने-जाने में परेशानी होती है। बरसात के दौरान विद्यालय का रास्ता और परिसर पानी से भर जाने पर छोटे बच्चों के लिए स्थिति और भी मुश्किल हो जाती है। सवाल यह है कि यदि विद्यालय परिसर में जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं है तो आखिर मिशन कायाकल्प के तहत किए गए कार्यों की निगरानी किस स्तर पर की गई?
कागज पर सुविधाएं, धरातल पर अधूरी तस्वीर_
मिशन कायाकल्प का उद्देश्य केवल विद्यालय भवन की रंगाई-पुताई तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित और सुविधाजनक वातावरण तैयार करना भी है। इसके बावजूद यदि बारिश के दौरान विद्यालय परिसर तालाब में तब्दील हो जाए, तो यह समझना जरूरी हो जाता है कि निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, जल निकासी की व्यवस्था और कार्य पूर्ण होने के बाद निरीक्षण की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। उनके लिए विद्यालय ही शिक्षा के साथ-साथ सुरक्षित वातावरण का प्रमुख माध्यम है। ऐसे में मूलभूत सुविधाओं की कमी सीधे बच्चों की पढ़ाई और स्कूल आने की नियमितता को प्रभावित कर सकती है।
जिम्मेदारी तय करने की जरूरत_
मिशन कायाकल्प के तहत विद्यालयों में कार्य कराने के लिए धनराशि और जिम्मेदारियां निर्धारित हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जिन विद्यालयों में काम पूरा दिखाया गया, वहां बरसात के दौरान जलभराव जैसी समस्या क्यों बनी हुई है? क्या कार्यों की गुणवत्ता की जांच की गई? क्या विद्यालय का भौतिक निरीक्षण कर यह देखा गया कि कराए गए कार्य वास्तव में बच्चों के लिए उपयोगी हैं या नहीं?
जरूरत इस बात की है कि विद्यालयवार कराए गए कायाकल्प कार्यों, खर्च हुई धनराशि और उनके वर्तमान भौतिक स्वरूप का स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सत्यापन कराया जाए। केवल रिकॉर्ड में कार्य पूर्ण होना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका लाभ बच्चों तक पहुंचना भी जरूरी है।
बच्चों के हक की सुविधाएं सवालों के घेरे में_
सरकार सरकारी विद्यालयों को निजी स्कूलों की तर्ज पर बेहतर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास करने की बात कहती है। लेकिन जब जमीनी स्तर पर बच्चों को बारिश के पानी, जलभराव और अन्य मूलभूत समस्याओं से जूझना पड़े, तो मिशन कायाकल्प की सफलता का आकलन केवल सरकारी आंकड़ों से नहीं किया जा सकता।
बरेली के सरकारी विद्यालयों की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए विद्यालयवार निरीक्षण, अभिभावकों और शिक्षकों से बातचीत तथा कायाकल्प के तहत खर्च की गई धनराशि और कराए गए कार्यों का मिलान जरूरी है। आखिर सवाल सरकारी भवन का नहीं, उन बच्चों के भविष्य का है जिनके लिए इन सुविधाओं का वादा किया गया है।


