
कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 21 अगस्त : समर्थगुरु धारा हिमाचल के शिक्षा कोऑर्डिनेटर आचार्य डॉ. सुरेश मिश्रा ने बताया कि समर्थगुरु धाम, मुरथल के संस्थापक समर्थगुरु सिद्धार्थ औलिया के सान्निध्य में दिव्यता और आनंद से भरा आध्यात्मिक उत्सव मनाया गया।
मिशन सतनाम के अंतर्गत संत विजेंद्र दास जी का समर्थगुरु धाम में बाबा से भेंट करने आना हुआ। संत विजेंद्र दास, गुलाब दास के पंथ से है। उनका शॉल ओढ़ा कर स्वागत किया फिर संत संगोष्ठी हुई और ने फिर अपना रॉब
( गाउन ) उनको भेंट किया। अपार करुणा करके उनको अपनी माला दीक्षा में दी और इस संत संगोष्ठी के दौरान समर्थगुरु जी ने बताया की खुद संत गुलाब दास सूक्ष्म रूप से प्रकट हो गए थे और बहुत ही आनंददायक अनुभव भी हुआ और फिर समर्थगुरु, संत विजेंद्र दास को खुद बाहर तक विदा करने आए और यह संत संगोष्ठी लगभग 3 घंटे रही। आज ट्विटर के माध्यम से आदरणीय समर्थगुरू सिद्धार्थ औलिया ने विशेष बताया कि नाम को जिसने जान लिया, ओंकार को जिसने जान लिया, उसने वेद के सारे रहस्यों को जान लिया।
वन्दे मातरम् भारत की अस्मिता का उद्घोष है। यह भारत का राष्ट्रगीत है। इसका विरोध कुछ लोग जिस पाक कलमा के आधार पर कर रहे हैं, वह निराधार है। पाक कलमा नीचे उद्धृत हैः ‘ला इलाह इल अल्लाह,मुहम्मदुर रसूल अल्लाह।’
मुल्ला-मौलवी इसका अर्थ करते हैं-‘खुदा के सिवा कोई अन्य पूजनीय नहीं है। हजरत मुहम्मद अल्लाह के रसूल अर्थात् पैगंबर हैं।’
जबकि गिरडीह के सूफी बाबा शाह कलंदर और अन्य सूफी संत इसका अर्थ बताते हैं-‘ नहीं है प्राणी परमात्मा से भिन्न। हजरत मुहम्मद अल्लाह के आइना हैं अर्थात् उनमें अल्लाह की छवि देखी जा सकती है।’
हजरत मुहम्मद साहब अन्यत्र कहते हैं – ‘ज़र्रे जर्रे में ख़ुदा है।’
मुल्ला-मौलवियों का तर्क यदि थोड़ी देर के लिये सही भी मान लिया जाए कि अल्लाह के सिवा कोई पूजनीय नहीं है, तो परमात्मा सर्वव्यापी कैसे है ? इस्लाम के 5 अरकानों (स्तंभों) में पहला है तौहीद अर्थात् परमात्मा अद्वैत है, सर्व व्यापी है। इस आधार पर हर व्यक्ति, जीव, यहाँ तक कि पत्थर में भी खुदा को उपस्थित जानकर सज्दा किया जा सकता है।
एक सूफी शायर कहता है – ‘मैंने तो अपनी मौज में अपना सर झुका दिया, अब खुदा मालूम, वह काबा था या बुतख़ाना था ‘
फिर काशी या काबा, पीर या भारत माता की वंदना करने में क्या हर्ज है ? मां मीरा और आचार्य सोहम जी सत्संग में उपस्थित रहे और बहुत आध्यात्मिक आनंद लिया ।


