रंगरथ नाट्य महोत्सव में मंचित हुआ नाटक सम्राट अशोक

रंगरथ नाट्य महोत्सव में मंचित हुआ नाटक सम्राट अशोक

सफीदों के कलाकारों ने दिखाई प्रतिभा।
कला कीर्ति भवन में नाटक सम्राट अशोक ने दिखाए अशोक के जीवन द्वंद्व, तालियों से गूंजा सभागार।
अशोक के जीवन के अनछुए पहलुओं को उजागर कर गया नाटक ‘‘सम्राट अशोक’’
अहिंसा परमो धर्म का संदेश दे गया नाटक सम्राट अशोक।

थानेसर, प्रमोद कौशिक/संजीव कुमारी 28 मार्च : विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर हरियाणा कला परिषद द्वारा कला कीर्ति भवन में तीन दिवसीय रंगरथ नाट्य महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसके पहले दिन रास कला मंच सफीदों के कलाकारों ने नाटक सम्राट अशोक का मंचन किया। कला परिषद के निदेशक विवेक कालिया के नेतृत्व में आयोजित तीन दिवसीय नाट्य उत्सव के पहले दिन वरिष्ठ रंगकर्मी बृजकिशोर शर्मा, नीरज सेठी, चंद्रशेखर दुआ, सुरेखा और हरियाणा कला परिषद के कार्यालय प्रभारी धर्मपाल ने दीप प्रज्जवलित कर उत्सव का शुभारम्भ किया। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। पद्मश्री दया प्रकाश सिन्हा द्वारा लिखित और अंकिता के निर्देशन तथा रविमोहन के मार्गदर्शन में मंचित लगभग दो घण्टे की अवधि वाला नाटक सत्ता, युद्ध और विजय की कथा से आगे बढ़कर एक ऐसे शासक की आत्मिक यात्रा को दिखाता है, जो हिंसा के मार्ग से हटकर करुणा और धम्म के रास्ते पर चलता है। कंलिग युद्ध की विभीषिका अशोक के अंदर गहरा द्वंद्व पैदा करती है। युद्धभूमि में बहता रक्त, स्त्रियों और बच्चों की चीखें, उजड़ते हुए नगर सब अशोक के हृदय को झकझोर देते हैं और यहीं से अशोक का परिवर्तन प्रारम्भ होता है। सम्राट अशोक में दिखाया कि अशोक जन्म के समय से ही काफी कुरूप थे। लेकिन एक वीर योद्धा थे।
कलिंग युद्ध ने बदली अशोक की मनोदशा, हिंसा को त्याग अहिंसा का मार्ग अपनाया।
अशोक बिन्दुसार का पुत्र था। उनकी मां धर्मा उपेक्षित थी। अशोक के जन्म के बाद उन्हें स्वीकारा गया। इसलिए पुत्र का नाम अशोक रखा। अशोक उज्जयिनी के शासन बने। बिन्दुसार से उसने जबरन राज्याधिकार प्राप्त किया था। उस आघात में बिन्दुसार की मौत हो गई। राज-सिंहासन के लिए उसकी लड़ाई बड़े भाई सुसीम के साथ हुई थी। भाई की हत्या कर उसने सत्ता हथियाई थी, इसलिए उसे पितृहन्ता और भ्रातहन्ता के साथ चंडाशोक भी कहा गया। नाटक में दिखाया गया कि अशोक पहले बौद्ध मत के विरूद्ध था, लेकिन कारागार में बंद एक बौद्ध भिक्षु के चमत्कारों से प्रभावित होकर वह बौद्ध धर्म से दीक्षित हो गया। अशोक के अंतपुर में 500 स्त्रियां थीं। जो स्त्रियां उसकी कुरूपता से क्षुब्ध होती थी, वह क्रूरतापूर्वक उन्हें जला देता था। कुरूपता के कारण उसने अपना नाम प्रियदर्शी भी रखा था। कलिंग युद्ध के बाद बुद्ध के चरणों में शरण लेने की यात्रा को कलाकारों द्वारा बड़ी ही गहराई से उकेरा गया है। इतिहास को वर्तमान से जोड़ते हुए नाटक दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि सच्चा साम्राज्य मनुष्य के भीतर बनता है। जीवन में किसी भी चीज की अधिकता सदैव पतन की ओर ले जाती है। नाटक में अशोक का किरदार अंकित राज सोनल ने निभाया। देवी की भूमिका में अंकिता, राधागुप्त मनोज कुमार, बिंदुसार प्रियांश सेहर, उपगुप्त कृष, सागरमते रौनक, भिक्षु हर्षित वर्मा, तिस्य आशीष पाठक, कात्यायन वंशिता भारद्वाज तथा अन्य भूमिकाओं में प्रिया, अनिशा कुमारी, सौरभ डागर, मोहित सैनी, दीपांश आदि रहे। संगीत आकाश तथा प्रकाश व्यवस्था रवि मोहन ने संभाली। रूप सज्जा धर्मेश ने की।
रंगरथ नाट्य उत्सव में आज होगा नाटक राम नाम सत्य है।
विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर आयोजित रंगरथ नाट्य उत्सव के समापन पर आज 29 मार्च को कला कीर्ति भवन में नाटक राम नाम सत्य है मंचित होगा। सोनू रोंझिया के निर्देशन और चंद्रशेखर फनसलकर के लेखन में भिवानी के कलाकार शाम साढ़े छह बजे नाटक का मंचन करेंगे।

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