
कल्पना की दुनिया से निकलकर वास्तविकता की दुनिया का ‘इल्हाम’
कुरुक्षेत्र, प्रमोद कौशिक 20 अगस्त : हरियाणा कला परिषद तथा उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) के संयुक्त तत्वावधान में कुरुक्षेत्र के कला कीर्ति भवन (भरतमुनि रंगशाला) में आयोजित पांच दिवसीय पंचजन्य नाट्य समारोह के तीसरे दिन रंगमंच की एक बेहद गंभीर और विचारोत्तेजक प्रस्तुति देखने को मिली। उत्सव कला मंच, चंडीगढ़ के प्रतिभावान कलाकारों द्वारा प्रसिद्ध नाटक इल्हाम का अत्यंत भावपूर्ण और जीवंत मंचन किया गया। इस विशेष अवसर पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. विवेक चावला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। हरियाणा कला परिषद के उपाध्यक्ष महेश जोशी ने मुख्य अतिथि डॉ. विवेक चावला को अंगवस्त्र भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। कार्यक्रम का विधिवत शुभारम्भ मुख्य अतिथि और विशिष्ट जनों द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। पूरे कार्यक्रम के दौरान रंगमंच के बेहतरीन मिजाज को बनाए रखते हुए मंच का कुशल संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया।
आत्मज्ञान और समाज के दोहरे मापदंडों के बीच झूलती जिंदगी को दिखा गया नाटक ‘इल्हाम’।
मशहूर लेखक, फिल्म अभिनेता मानव कौल द्वारा लिखित तथा युवा रंगकर्मी सार्थक सिंह के कुशल निर्देशन में मंचित नाटक इल्हाम आधुनिक समाज, मानव मन के अंतर्द्वंद्व और अस्तित्व की लड़ाई को बयां करता है। इल्हाम एक अरबी शब्द है जिसका सीधा अर्थ होता है आत्मज्ञान। नाटक की कहानी भगवान नाम के एक सीधे-साधे मध्यमवर्गीय बैंक कर्मचारी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी पत्नी पूनम और बच्चों के साथ एक सामान्य ढर्रे पर जिंदगी जी रहा होता है। एक दिन अचानक पार्क में एक बेंच पर बैठे हुए भगवान को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। वह इस भौतिक संसार की भागदौड़ से परे हटकर एक परम आनंद, शांति और संतोष की अवस्था में पहुंच जाता है। वह प्रकृति से बातें करने लगता है, अकेले हंसता है और अपनी ही कल्पना के किरदारों में खो जाता है। त्रासदी तब शुरू होती है जब समाज और उसका अपना परिवार इस आत्मिक शांति और गहरे बदलाव को समझ नहीं पाता। दुनिया की नजर में सांसारिक नियमों और भाषा को भूल जाना केवल एक मानसिक बीमारी या पागलपन लगने लगता है। परिवार वाले उसे ठीक करने के लिए डॉक्टरों और ओझा-तांत्रिकों के चक्कर काटने लगते हैं। चण्डीगढ़ के कलाकारों ने अपने मर्मस्पर्शी अभिनय, प्रतीकात्मक दृश्यों और सधे हुए संवादों से यथार्थ और कल्पना के बीच के इस कड़े संघर्ष को मंच पर इतनी शिद्दत से उतारा कि कला कीर्ति भवन में बैठे हर दर्शक भाव विभोर हो गया। यह नाटक सीधे तौर पर समाज से सवाल करता है कि क्या इस बनावटी दुनिया में सचमुच शांत और खुश रहना पागलपन है? कार्यक्रम के बाद मुख्य अतिथि डॉ. विवेक चावला ने संबोधित करते हुए कहा कि इल्हाम जैसे दर्शन और मनोविज्ञान से भरे नाटक को मंच पर इतनी सहजता से उतारना बेहद सराहनीय है। कलाकार सदैव अपने अभिनय से समाज को नई राह देने का कार्य करते हैं। ऐसे राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने और समाज को एक नई सोच देने का काम करते हैं। नाटक में शुभम शर्मा, गुलशन कुमार, मेहूल राणा, आर्यन सैनी, प्रणव, संदीप शर्मा, अनमोल, अक्षय, मीनाक्षी भट्ट, आदर्श यादव, अनंदिता सिंह मनकोटिया, भाव्यांश, दूर्गा, अंगद, इक्षित, अभिनंदन तथा किंजल ने अपनी भूमिका अदा की। नाटक के बाद कलाकारों तथा अतिथियों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर कुरुक्षेत्र के भारी संख्या में कलाप्रेमी, रंगकर्मी और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे, जिन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट से चण्डीगढ़ की पूरी नाट्य टीम का उत्साहवर्धन किया।


